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कानपुर;फर्जी वसीयत बनवा तीन लोगों ने कर दिया कांड, केडीए के दिवंगत जेई की संपत्ति पर किया दावा, जानें मामला





31 साल पहले कानपुर विकास प्राधिकरण में तैनात रहे ए

 जेई की बर्रा-तीन स्थित संपत्ति को हथियाने के लिए क्षेत्र के ही तीन लोगों ने फर्जी वसीयत बनाकर दावा कर दिया। कोर्ट में जब वसीयतों को मान्यता दिलाने के लिए लाए गए वाद पर सुनवाई शुरू हुई तो मृतक की पत्नी ने दो बेटों की जानकारी रख दी। इसके बाद फर्जी वसीयतों के सहारे धोखाधड़ी की कोशिश करने वालों के खिलाफ कोर्ट ने मुकदमा दर्ज करने के आदेश दे दिए। गाजियाबाद के पटेलनगर निवासी शांतनु अग्रवाल वर्ष 1993 तक केडीए में जेई थे। साल 1994 में शांतनु का बुलंदशहर स्थानांतरण हो गया। इसके बाद उन्होंने आवेदन किया और 13 फरवरी 1995 को उन्हें बर्रा-3 स्थित केडीए मार्केट के द्वितीय तल पर स्थित मकान नंबर ए-9 आवंटित हो गया। 1999 में उनका गाजियाबाद स्थानांतरण हुआ और 1 अगस्त 2001 को वहीं शांतनु की मौत हो गई।

शांतनु ने जब मकान की किश्तें जमा नहीं कीं तो केडीए ने 11 मई 2011 को किश्तों की वसूली के लिए नोटिस भेजा। नोटिस की जानकारी शांतनु के परिवार को तो नहीं मिली लेकिन कुछ धोखेबाजों को लग गई। उन्होंने धोखाधड़ी का जाल बुनना शुरू कर दिया और एक महिला के जरिये शांतनु को नि:संतान बताकर उसकी बहन के तौर पर फर्जी वसीयत तैयार की और अदालत से उसे मान्यता दिलाने के लिए वर्ष 2011 में दाखिल कर दिया।


इसी बीच मोहल्ले का एक युवक खुद को शांतनु का दत्तक पुत्र बताकर एक वसीयत कोर्ट के सामने ले आया। वहीं, एक और युवक शांतनु को अपने पिता का घनिष्ठ मित्र बताकर एक और वसीयत बनवा लाया। अदालत के सामने जब तीन अपंजीकृत वसीयतें आईं तो उनमें एक वसीयत शांतनु अग्रवाल ने 8 जुलाई 2000 को हर्ष जौहरी के पक्ष में, दूसरी आठ दिसंबर 2000 को जसविंदर सिंह के पक्ष में और तीसरी 15 जून 2001 को आदित्य पांडे के पक्ष में थी।

न्यायाधीश ने जब गाजियाबाद विकास प्राधिकरण में कार्यरत रहे शांतनु की पत्नी रजनी अग्रवाल को अदालत बुलाया, तो उसने चौंकाने वाला खुलासा किया। रजनी ने शांतनु के दो बेटे होने के साथ ही वसीयतों को फर्जी बताया। फर्जीवाड़े का खुलासा होने पर कोर्ट ने फर्जी वसीयत लाने वाले तीन और उनके छह गवाहों कुल नौ लोगों के खिलाफ प्रकीर्ण वाद दर्ज करने के आदेश कर दिए


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